“सियासी घेरे में Vasundhara Raje, क्या राजनीतिक जमीन बचाने की जद्दोजहद?”

(मतीष पारीक)

जयपुर, 12 मार्च 2026(न्याय स्तंभ)। राजस्थान की राजनीति में इन दिनों पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की बढ़ती सक्रियता को लेकर नए सवाल खड़े हो रहे हैं। पिछले कुछ समय से राजे भाजपा के लगभग हर बड़े कार्यक्रम में दिखाई दे रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभाओं में उनकी मौजूदगी लगातार दर्ज हो रही है और हाल ही में वे अपने परिवार के साथ प्रधानमंत्री से मुलाकात कर वापस लौटी हैं।

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि यह सक्रियता सामान्य राजनीतिक उपस्थिति से ज्यादा बदलते सियासी समीकरणों के बीच अपनी जमीन बचाने की रणनीति के रूप में देखी जा रही है।

मुख्यमंत्री चयन के बाद बदला शक्ति संतुलन
विधानसभा चुनाव के बाद जब भाजपा आलाकमान ने भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी दी, तब प्रदेश भाजपा की अंदरूनी राजनीति में बड़ा बदलाव आया।

मुख्यमंत्री पद की दौड़ में लंबे समय तक वसुंधरा राजे का नाम प्रमुख दावेदारों में माना जा रहा था, लेकिन अंतिम समय में पार्टी ने नया चेहरा आगे कर दिया। इसके बाद से ही राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई कि पार्टी नेतृत्व ने राजस्थान में नए शक्ति केंद्र को स्थापित करने का फैसला कर लिया है।

राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि सत्ता परिवर्तन के बाद पार्टी के भीतर कई पुराने समीकरण कमजोर पड़ते दिखाई दिए और राजे का प्रभाव भी पहले जैसा मजबूत नहीं रहा।

अंता चुनाव बना बड़ा सियासी संकेत

राजनीतिक पंडित हाल ही में सम्पन्न हुए अंता क्षेत्र के चुनाव को भी इस पूरे घटनाक्रम से जोड़कर देख रहे हैं।
बताया जाता है कि इस चुनाव में मोारपाल सुमन को टिकट दिलाने में वसुंधरा राजे की भूमिका अहम मानी गई थी। भारी विरोध के बावजूद राजे ने यह भरोसा जताया था कि यह सीट जीतकर भाजपा के खाते में आएगी।

लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार पार्टी के भीतर की कलह और गुटबाजी इस चुनाव में खुलकर सामने आ गई। कई विरोधी खेमे राजे के इस फैसले को गलत साबित करने के लिए एकजुट होते दिखाई दिए। इस पूरे घटनाक्रम ने राजनीतिक गलियारों में यह संदेश भी दिया कि अब राजस्थान में चुनावी रणनीति के मामले में वसुंधरा राजे का प्रभाव पहले जैसा निर्णायक नहीं रहा।
 

पार्टी के भीतर सीमित होती भूमिका!

सत्ता परिवर्तन के बाद कई ऐसे घटनाक्रम भी सामने आए, जिन्होंने यह संकेत दिया कि पार्टी के भीतर राजे की भूमिका सीमित होती जा रही है। मुख्यमंत्री चयन के बाद हुए कई प्रमुख कार्यक्रमों में उनकी भूमिका अपेक्षाकृत सीमित दिखाई दी।
मंच और प्रोटोकॉल को लेकर भी कुछ मौकों पर ऐसी स्थिति बनी, जिसने राजनीतिक हलकों में चर्चा को जन्म दिया।
जेैसे संगठन और सरकार के कई महत्वपूर्ण निर्णयों में उनकी सक्रिय भूमिका पहले जैसी दिखाई नहीं दी।
हालांकि भाजपा की ओर से आधिकारिक तौर पर इस तरह की किसी भी दूरी से हमेशा इनकार किया गया है।


क्या आलाकमान के सामने झुकीं राजे?

राजनीति के जानकारों का मानना है कि इन सभी घटनाक्रमों के बाद वसुंधरा राजे ने भी बदलते सियासी माहौल को समझ लिया है। कई राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि राजे ने अब पार्टी आलाकमान के साथ टकराव की जगह संतुलन और स्वीकार्यता की रणनीति अपनाई है। यही वजह है कि वे लगातार केंद्रीय नेतृत्व के कार्यक्रमों में नजर आ रही हैं और यह संदेश देने की कोशिश कर रही हैं कि वे पार्टी लाइन के साथ खड़ी हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार यह कदम कहीं न कहीं उनके राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित रखने की रणनीति भी माना जा रहा है, ताकि आने वाले समय में उनकी साख और राजनीतिक प्रासंगिकता पर कोई बड़ा असर न पड़े।

अपनी जमीन बचाने की सियासी कवायद!

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि राजस्थान भाजपा में शक्ति संतुलन बदल चुका है और इसी बदले हुए दौर में वसुंधरा राजे अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए सक्रिय नजर आ रही हैं।
एक समय प्रदेश भाजपा की सबसे मजबूत नेता मानी जाने वाली राजे के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे बदलते सियासी समीकरणों के बीच अपने प्रभाव और राजनीतिक भविष्य को कैसे बनाए रखती हैं।

फिलहाल इतना जरूर कहा जा रहा है कि राजस्थान भाजपा की राजनीति में सत्ता का केंद्र बदल चुका है, और इसी के बीच वसुंधरा राजे अपने सियासी अस्तित्व और जमीन को बचाए रखने की कोशिश करती दिखाई दे रही हैं।

राजनीतिक गलियारों में अब निगाहें इसी बात पर टिकी हैं कि आने वाले समय में यह सियासी कहानी किस मोड़ पर जाकर ठहरती है। और कि राजनितिक पंडित की भविष्यवाणी सही होती है ये तो समय ही बताएगा।

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