बंगाल में भाजपा की बड़ी जीत: रणनीति, संगठन और ‘राजस्थान कनेक्शन’ बना गेमचेंजर”
मोदी-शाह की मेहनत, बंसल-यादव की रणनीति और राजस्थान टीम की ज़मीनी पकड़ ने बदली तस्वीर
(मतीष पारीक)
जयपुर,05 मई 2026(न्याय स्तंभ)।पश्चिम बंगाल के हालिया चुनावी नतीजों ने यह साफ कर दिया है कि अब राज्य की राजनीति केवल स्थानीय दायरे तक सीमित नहीं रही। इस बार चुनाव में रणनीतिक योजना, संसाधनों का व्यापक उपयोग और विभिन्न राज्यों से पहुंचे कार्यकर्ताओं की सक्रिय भागीदारी ने मुकाबले को पहले से कहीं अधिक जटिल बना दिया।
चुनाव के दौरान यह देखने को मिला कि राष्ट्रीय स्तर के नेताओं—जैसे नरेंद्र मोदी और अमित शाह—ने लगातार रैलियां और रोड शो किए, जिससे चुनावी माहौल पर सीधा असर पड़ा। वहीं संगठनात्मक स्तर पर सुनील बंसल और भूपेंद्र यादव जैसे नेताओं की रणनीतियों ने चुनावी मैनेजमेंट को अधिक व्यवस्थित रूप दिया।
दिलचस्प पहलू यह रहा कि इस बार दूसरे राज्यों, खासकर राजस्थान से भी बड़ी संख्या में राजनीतिक कार्यकर्ता और पदाधिकारी बंगाल पहुंचे। इनमें अरुण चतुर्वेदी, सीपी जोशी, गजेंद्र सिंह शेखावत, राजेंद्र राठौड़, अशोक प्राणामी, कैलाश चौधरी, रामचरण बोहरा, विष्णु चेतानी, जितेंद्र गोठवाल, अतुल भंसाली, शंकर सिंह राजपुरोहित, मोतीलाल मीणा, मनोज राजोरिया, लादूलाल तेली, वासुदेव चावला, पवन दुग्गल, अशोक सैनी, कमलेश पुरोहित, अभिनेश महर्षि, रवि नैय्यर, सोमकांत शर्मा, छगन राजपुरोहित, राजेश बाबल, वेदप्रकाश पटेल, सुनील छाबड़ा, गुरवीर सिंह बराड़, सुभाष मील, वेदप्रकाश खटीक, ओमप्रकाश बिजारणिया, ओमप्रकाश भादाना, सुरेंद्र पारिक, रामलाल शर्मा, बिहारी बिश्नोई, नीरज जैन, सुशील कटारा, गोवर्धन वर्मा, राकेश पाठक, अखिलेश प्रताप सिंह, अखिलेश पारिक, कुमार लाखोटिया, पवन पुजारी, अभय बिदूरी, अमन सैनी, राजवीर यादव, हुलाश भाटी और सीताराम बिश्नोई शामिल रहे।
इनकी भूमिका अलग-अलग क्षेत्रों में प्रबंधन, समन्वय और चुनावी गतिविधियों को गति देने तक सीमित रही, लेकिन इसने यह संकेत जरूर दिया कि अब चुनावों में “इंटर-स्टेट नेटवर्किंग” एक नया ट्रेंड बनता जा रहा है।
हालांकि, चुनावी विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी परिणाम का अंतिम आधार स्थानीय मतदाता ही होते हैं। बंगाल में भी रोजगार, विकास, स्थानीय नेतृत्व और क्षेत्रीय मुद्दों ने निर्णायक भूमिका निभाई।
कुल मिलाकर, यह चुनाव केवल राजनीतिक दलों के बीच मुकाबला नहीं था, बल्कि बदलते चुनावी तौर-तरीकों, संसाधनों के विस्तार और मतदाताओं की प्राथमिकताओं के बीच संतुलन का एक बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया है।