ऋतु बनावत से विवाद में ईओ निलंबित, मदन राठौड़-ओम कसेरा मामले में चुप्पी क्यों? भाजपा कार्यकर्ता लामबंद
एक मामले को सीएमओ ने ही निपटा दिया, एक कि शिकायत केंद्रीय नेतृत्व तक होने का दावा
जयपुर, 13 जून 2026(न्याय स्तंभ) बयाना नगर पालिका की अधिशासी अधिकारी अनिता कुमारी के निलंबन के बाद भाजपा संगठन और राजनीतिक गलियारों में एक नई चर्चा शुरू हो गई है। चर्चा इस बात को लेकर है कि आखिर अलग-अलग मामलों में सरकार का रवैया अलग क्यों दिखाई दे रहा है।
बयाना में विधायक ऋतु बनावत और नगर पालिका की अधिशासी अधिकारी के बीच हुए विवाद का मामला मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंचा था। इसके बाद स्वायत्त शासन विभाग ने ईओ को निलंबित कर दिया। सरकार की इस कार्रवाई को लेकर किसी को आपत्ति नहीं है, लेकिन इसी के साथ एक दूसरा मामला भी फिर चर्चा में आ गया है।
कुछ समय पहले जयपुर नगर निगम आयुक्त ओम कसेरा और भाजपा प्रदेशाध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद मदन राठौड़ के बीच हुए कथित टेलीफोनिक विवाद की राजनीतिक गलियारों में काफी चर्चा रही थी। उस समय भाजपा के अंदर भी यह मामला चर्चा का विषय बना था। पार्टी सूत्रों के अनुसार इसकी जानकारी केंद्रीय नेतृत्व तक भी पहुंची थी।
अब बयाना में हुई कार्रवाई के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच यह सवाल पूछा जा रहा है कि जब एक मामले में मुख्यमंत्री कार्यालय तक बात पहुंचने के बाद तुरंत निर्णय हो सकता है तो फिर दूसरे मामले में, जिसकी चर्चा केंद्रीय नेतृत्व तक होने की बात कही जाती रही, अब तक कोई निर्णय सामने क्यों नहीं आया।
भाजपा के कई कार्यकर्ता यह भी पूछ रहे हैं कि यदि प्रदेशाध्यक्ष जैसे बड़े पद पर बैठे नेता की नाराजगी और शिकायत की चर्चाएं सार्वजनिक रूप से होती रहीं, तो फिर सरकार की ओर से स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं की गई। यही कारण है कि संगठन के भीतर यह मामला समय-समय पर चर्चा में आता रहा है।
वहीं दूसरी ओर, जयपुर नगर निगम आयुक्त ओम कसेरा को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। राजनीतिक हलकों में कहा जा रहा है कि लगातार विवादों में नाम आने और शिकायतों की चर्चाओं के बावजूद उनके खिलाफ किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं होना उनकी मजबूत प्रशासनिक स्थिति को दर्शाता है। कई लोग इसे प्रशासनिक स्तर पर उनकी पकड़ से जोड़कर भी देख रहे हैं।
बयाना की कार्रवाई के बाद अब सवाल केवल एक निलंबन का नहीं रह गया है। सवाल यह है कि क्या दोनों मामलों की परिस्थितियां अलग थीं या फिर सरकार ने दोनों मामलों को अलग नजरिए से देखा। फिलहाल इसका जवाब सरकार के पास है, लेकिन भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा जरूर जोर पकड़ चुकी है कि आखिर जयपुर वाले मामले में अब तक तस्वीर साफ क्यों नहीं हो सकी।