पहली बार पार्टी कार्यकर्ता ही पहुंचा कोर्ट, केंद्रीय नेतृत्व असमंजस में, प्रदेश भाजपा से मांगा जवाब

जयपुर, 12 अगस्त 2026(न्याय स्तंभ)। चांदपोल मंडल अध्यक्ष विवाद अब जयपुर से निकलकर दिल्ली तक पहुंच गया है। कपिल गुर्जर की ओर से न्यायालय के जरिए भाजपा के संगठन महामंत्री, प्रदेशाध्यक्ष, शहर अध्यक्ष, अनुशासन समिति और नव नियुक्त मंडल अध्यक्ष कैलाश टेकेवाला को नोटिस भेजे जाने के बाद मामला भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की नजर में आ गया। सूत्रों के अनुसार, दिल्ली में बैठे शीर्ष नेतृत्व ने राजस्थान भाजपा नेतृत्व पर नाराजगी जताते हुए सवाल किया कि पार्टी की ऐसी किरकिरी कराने वाला मामला आखिर सामने कैसे आया और मामले का जल्द पटाक्षेप करने के निर्देश दिए।

दरअसल, पूरे विवाद की जड़ शहर अध्यक्ष अमित गोयल की कथित चूक को माना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, कपिल गुर्जर के खिलाफ अनुशासन समिति जांच कर कार्रवाई की अनुशंसा कर चुकी थी। ऐसे में पहले कपिल गुर्जर के मामले में स्पष्ट कार्रवाई होनी थी, लेकिन मामला लंबा खिंचता रहा और वे पद पर बने रहे। इसके बाद उसी पद पर कैलाश टेकेवाला की नियुक्ति कर दी गई। एक तरफ पुराने अध्यक्ष पद पर कायम और दूसरी तरफ नए अध्यक्ष की नियुक्ति—यही संगठनात्मक पेच आखिर कोर्ट तक पहुंच गया।

कोर्ट का नोटिस पहुंचने के बाद आनन-फानन में कपिल गुर्जर को भाजपा प्रदेश कार्यालय बुलाया गया। बैठक में संगठन महामंत्री अजेय कुमार, जयपुर शहर अध्यक्ष अमित गोयल, किशनपोल से भाजपा प्रत्याशी रहे चन्द्रमोहन बटवाड़ा और कपिल गुर्जर मौजूद रहे। संगठन के नेताओं ने कपिल गुर्जर से समझाइश की और मामला आगे नहीं बढ़ाने को कहा।

न्याय स्तंभ ने जब अमित गोयल से इस मामले पर बात करनी चाही तो उन्होंने कोई विस्तृत जवाब नहीं दिया, लेकिन जाते-जाते इतना जरूर कहा—“मामले का पटाक्षेप हो गया है।” सवाल यह है कि अगर मामला पटाक्षेप से सुलझ सकता था तो इसे कोर्ट और दिल्ली तक पहुंचने की नौबत क्यों आई? वहीं चन्द्रमोहन बटवाड़ा ने इसे संगठन का अंदरूनी मामला बताते हुए कहा कि बैठक में मामले को आपसी चर्चा से सुलझाने की बात हुई और कपिल गुर्जर से आगे मामला नहीं बढ़ाने को कहा गया है।

अब चांदपोल विवाद सिर्फ मंडल अध्यक्ष की कुर्सी का मामला नहीं रहा। शहर संगठन की कथित चूक ने प्रदेश नेतृत्व को असहज किया और मामला दिल्ली दरबार तक पहुंचा दिया। जिस पार्टी की पहचान अनुशासन से जुड़ी है, उसी पार्टी को अब अपने ही संगठनात्मक फैसले का जवाब देना पड़ रहा है।

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