निकाय चुनाव में टिकट का नया 'पावर सेंटर'! एक शहर अध्यक्ष ने शुरू किया बायोडाटा कलेक्शन काउंटर!
"चर्चा है कि 'हमारी सिफारिश नहीं, तो टिकट नहीं' का संदेश; चुनाव से पहले सक्रिय हुई महामंत्री, दावेदारों की लग रही कतार"
जयपुर, 02 अगस्त 2026(न्याय स्तंभ)। निकाय चुनाव की तारीखों का अभी आधिकारिक ऐलान भी नहीं हुआ, लेकिन चुनावी सरगर्मियां पूरे शबाब पर हैं। चर्चा है कि एक राष्ट्रीय पार्टी के शहर अध्यक्ष ने टिकटों को लेकर ऐसा माहौल बना दिया है कि संगठन से ज्यादा भरोसा अब "दरबार व्यवस्था" पर किया जा रहा है। शहर अध्यक्ष जी, जो हर बैठक में यह बताना नहीं भूलते कि उनकी सीधी चर्चा मुख्यमंत्री से होती है और संघ के एक वरिष्ठ प्रचारक से उनका रोज़ का संवाद है, इन दिनों कार्यकर्ताओं को भी यही संदेश दे रहे हैं कि “ऊपर से हरी झंडी मिल चुकी है, टिकट उसी को मिलेगा जिसकी सिफारिश हम करेंगे।”
इतना ही नहीं, नेताजी के दावों की ऊंचाई यहीं नहीं रुकती। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि वे यह भी कहते फिरते हैं कि राजस्थान ही नहीं, बल्कि पार्टी के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री भी संगठन का फीडबैक सीधे उनसे लेते हैं। ऐसे दावों के बाद कार्यकर्ताओं में यह चर्चा भी आम हो गई है कि टिकट की असली परीक्षा अब संगठन में नहीं, बल्कि नेताजी की चौखट पर होगी।
सूत्र बताते हैं कि शहर अध्यक्ष ने अपनी एक खास सिपहसालार महामंत्री को जिम्मेदारी सौंपी कि वे ऐसे लोगों के नाम एकत्र करें जो पार्षद चुनाव में दमदार दावेदार साबित हो सकते हैं। लेकिन महामंत्री जी शायद इस जिम्मेदारी को कुछ ज्यादा ही गंभीरता से ले रही हैं, चर्चा है कि संभावित नामों की सूची बनाने के बजाय उन्होंने सीधे बायोडाटा संग्रह अभियान शुरू कर दिया।
अब शहर में यह संदेश तेजी से फैलाया जा रहा है कि "टिकट तो हम ही तय करेंगे। हमारी सिफारिश के बिना किसी का बायोडाटा ऊपर गया तो उस पर वीटो लग जाएगा।"
बस फिर क्या था... चुनाव लड़ने की इच्छा रखने वाले कई नेता अब जनता से पहले महामंत्री जी की चौखट पर दस्तक देते नजर आ रहे हैं। कोई बायोडाटा लेकर पहुंच रहा है, तो कोई "आशीर्वाद" लेने। राजनीतिक गलियारों में तंज कसा जा रहा है कि आजकल टिकट की पहली शर्त जनाधार नहीं, बल्कि अध्यक्ष जी की "कृपा" है।
दिलचस्प यह भी है कि जिन महामंत्री का नाम इन चर्चाओं में लिया जा रहा है, उनका नाम पहले भी जमीन कब्जे से जुड़े आरोपों को लेकर विवादों में आ चुका है। हालांकि उन आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष या न्यायिक स्थिति अलग विषय है, लेकिन चुनावी मौसम में उनकी बढ़ती सक्रियता चर्चाओं को और हवा दे रही है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—पार्षद का टिकट पार्टी की अधिकृत प्रक्रिया से मिलेगा, या पहले "दरबार" से अनुमोदन लेना अनिवार्य होगा? अगर यही हाल रहा तो निकाय चुनाव से पहले शहर में सबसे व्यस्त जगह पार्टी कार्यालय नहीं, बल्कि "बायोडाटा दरबार" कहलाएगी।