“मशाल जुलूस में पार्टी लाइन का खुला उल्लंघन, फिर भी खामोशी—दोहरे रवैये पर सवाल, क्या होगी कार्रवाई?”

जयपुर, 01मई 2026(न्याय स्तंभ)। हाल ही में हुए भारतीय जनता पार्टी के जयपुर में हुए मशाल जुलूस ने संगठन की अनुशासन नीति पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। पार्टी के पूर्व पदाधिकारियों के अनुसार, जिस कार्यक्रम को अनुशासन और एकजुटता का संदेश देना था, वही मंच अब अंदरूनी अव्यवस्था और ‘अपने-अपने एजेंडे’ का प्रदर्शन बन गया।

पूर्व पदाधिकारियों के मुताबिक, जुलूस के दौरान अपूर्वा सिंह, पूर्व महिला मोर्चा प्रदेशाध्यक्ष सुमन शर्मा, भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेशाध्यक्ष राखी राठौड़ और कांग्रेस से भाजपा में आई पूर्व महापौर ज्योति खंडेलवाल समेत कुछ महिला नेत्रियों ने संगठनात्मक आदेशों की अवहेलना करते हुए अपने नेता की बात को भी दरकिनार कर दिया। आरोप है कि उन्होंने पार्टी का प्रोटोकॉल तोड़ते हुए अपने समूह में आगे बढ़ने का निर्णय लिया, जबकि प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ पीछे खड़े होकर महिलाओं को अनुशासन का पाठ पढ़ा रहे थे। इसके बावजूद ये नेत्रियां अपने अध्यक्ष की बातों को अनसुना कर आगे बढ़ गईं।

वहीं, इस मामले में भाजपा के जिला अध्यक्ष अमित गोयल पर भी सवाल उठे हैं। आरोप है कि जिलाध्यक्ष अमित गोयल ने तय प्रोटोकॉल को दरकिनार करते हुए सिर्फ पांच मशालों की जगह 60-70 मशालें जुलूस में शामिल कर दीं, जो किसी भी बड़े हादसे का कारण बन सकती थीं। इतना ही नहीं, उतावलेपन में महिलाओं को भी मशालें थमा दी गईं, जिससे सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो गए।

इस मामले में पार्टी कार्यकर्ताओं के निशाने पर पार्टी की महिला नेत्रियां हैं। आरोप है कि उन्होंने संगठनात्मक अनुशासन और प्रोटोकॉल की अनदेखी करते हुए जुलूस को अव्यवस्थित कर दिया। प्रशिक्षण के बावजूद अलग-अलग समूह बनाकर चलना और आगे निकलने की होड़ ने पार्टी की एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए।

वहीं, राखी राठौड़ पर भी सवाल उठ रहे हैं कि पूरे घटनाक्रम के दौरान उन्होंने पहल क्यों नहीं की। आरोप है कि वे चाहतीं तो महिलाओं को व्यवस्थित करवा सकती थीं और प्रोटोकॉल का पालन सुनिश्चित करवा सकती थीं, लेकिन उनकी निष्क्रियता अब चर्चा का विषय बन गई है।

इसके बाद, जब विवाद बढ़ा, तो संबंधित महिला नेत्रियों द्वारा एक जैसी ‘स्क्रिप्ट’ सोशल मीडिया पर डालकर पूरे घटनाक्रम पर पर्दा डालने की कोशिश भी चर्चा में रही।

अब यहां सवाल उठाते हुए पार्टी के पूर्व पदाधिकारियों ने कहा कि , क्या पार्टी अपनी ही रीति-नीति से समझौता कर रही है? पूर्व पदाधिकारियों का कहना है कि अतीत में ऐसे मामलों में पार्टी ने तुरंत नोटिस देकर निलंबन या निष्कासन जैसी कार्रवाई की है, लेकिन इस बार खामोशी कई सवाल खड़े कर रही है।

उनका कहना है कि क्या पार्टी कोई सख्त कार्रवाई करेगी, जिससे कार्यकर्ताओं और जनता के बीच स्पष्ट संदेश जाए कि अनुशासन सबके लिए समान है? कहीं ऐसा तो नहीं कि इस ‘अनुशासनहीनता’ पर भी सिफारिश या दबाव हावी है? फिलहाल, जनता के बीच यही संदेश जा रहा है—क्या पार्टी में अनुशासन भी अब ‘चयनात्मक’ हो गया है?

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