लाल पोटलियां लेकर राजधानी की ओर दौड़ रही कलेक्टर-एसपी की गाड़ियां... किस "जीत के मंत्र" की तलाश में सरकार?

"चलो कलेक्टर बैलट लेकर, चौथा पहिया ठेलेंगे... झंडा नहीं उठाने वाले, अब हम ही मिलकर चुनाव - चुनाव खेलेंगे!

(मतीष पारीक)

04 अगस्त 2026(न्याय स्तंभ)। पंचायत और निकाय चुनाव की आहट के बीच राजस्थान की राजनीति में इन दिनों एक नई तस्वीर चर्चा का विषय बनी हुई है। जिले-दर-जिले कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक राजधानी पहुंच रहे हैं और मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा उनसे वन-टू-वन बैठक कर रहे हैं। सरकारी पक्ष इसे प्रशासनिक समीक्षा और कानून-व्यवस्था की सामान्य प्रक्रिया बता सकता है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे चुनावी तैयारी से जोड़कर देखा जा रहा है। चर्चा यह भी है कि हर जिले से सिर्फ प्रशासनिक रिपोर्ट ही नहीं, बल्कि स्थानीय राजनीतिक माहौल, जनता के मूड और चुनावी समीकरण का फीडबैक भी राजधानी तक पहुंच रहा है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर सरकार को जीत का मंत्र अफसरों की रिपोर्ट में क्यों तलाशना पड़ रहा है?

भाजपा की पहचान हमेशा मजबूत संगठन वाली पार्टी के रूप में रही है। पन्ना प्रमुख, बूथ अध्यक्ष, शक्ति केंद्र, मंडल अध्यक्ष, जिलाध्यक्ष और हजारों समर्पित कार्यकर्ता उसकी सबसे बड़ी ताकत माने जाते रहे हैं। यही संगठन हर चुनाव में घर-घर जाकर मतदाता तक पहुंचता है। फिर ऐसा क्या बदला कि चुनावी माहौल समझने के लिए सबसे ज्यादा भरोसा अब प्रशासनिक अधिकारियों की बैठकों पर दिखाई दे रहा है? यह सवाल विपक्ष ही नहीं, पार्टी के भीतर भी फुसफुसाहट का विषय बनता जा रहा है।

हाल के महीनों में सरकार और संगठन के बीच तालमेल को लेकर कई तरह की चर्चाएं सामने आई हैं। तबादलों को लेकर असंतोष की बातें हों, चौपाल कार्यक्रमों में स्थानीय जनप्रतिनिधियों की नाराजगी की चर्चाएं हों या सेवा शिविरों में समन्वय की कमी के आरोप—इन घटनाओं ने यह संदेश जरूर दिया कि सरकार और संगठन के बीच संवाद पहले जैसा सहज नहीं दिख रहा। भले ही दोनों पक्ष सार्वजनिक रूप से एकजुट होने का दावा करें, लेकिन राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच उठ रहे सवालों को पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।

देश के हालिया विधानसभा चुनावों के नतीजों ने भी एक संदेश दिया है कि केवल सरकारी योजनाएं या प्रशासनिक रिपोर्ट चुनाव नहीं जितातीं। जहां संगठन जमीन पर मजबूत रहा, वहां उसका लाभ मिला और जहां कार्यकर्ताओं की नाराजगी या स्थानीय समीकरणों को समय रहते नहीं समझा गया, वहां परिणाम उम्मीद के अनुरूप नहीं रहे। चुनावी राजनीति में जनता की नब्ज कागजों से कम और लोगों के बीच ज्यादा मिलती है। यही कारण है कि अनुभवी राजनीतिक दल हमेशा संगठन की प्रतिक्रिया को सबसे महत्वपूर्ण मानते रहे हैं।

यही वजह है कि अब सवाल सिर्फ इन बैठकों का नहीं, बल्कि उस संदेश का है जो नीचे तक जा रहा है। यदि कार्यकर्ताओं को यह महसूस होने लगे कि उनकी बात से ज्यादा वजन अफसरों की रिपोर्ट का है, तो उसका असर संगठन के मनोबल पर भी पड़ सकता है। चुनाव सिर्फ प्रशासनिक प्रबंधन से नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं के उत्साह, जनता के विश्वास और नेतृत्व के संवाद से जीते जाते हैं।

सरकार के लिए यह समय आत्ममंथन का भी है और संगठन के लिए भी। अगर कहीं कार्यकर्ता उपेक्षित महसूस कर रहे हैं, अगर स्थानीय स्तर पर संवाद कमजोर पड़ा है या सरकार और संगठन के बीच दूरी की धारणा बन रही है, तो उसका समाधान बैठकों की फाइलों में नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं और जनता के बीच जाकर निकलेगा। जनता की नब्ज को समझने का सबसे भरोसेमंद माध्यम आज भी वही कार्यकर्ता है, जो हर दिन लोगों के बीच रहता है।

अफसर प्रशासन चला सकते हैं, व्यवस्था संभाल सकते हैं और निष्पक्ष फीडबैक भी दे सकते हैं, लेकिन चुनावी वैतरणी पार कराने की जिम्मेदारी अंततः राजनीतिक संगठन की ही होती है। यदि जीत का रास्ता केवल लाल पोटलियों में बंद रिपोर्टों से खोजा जाएगा, तो शायद तस्वीर अधूरी रह जाएगी। सरकार और संगठन दोनों को यह याद रखना होगा कि चुनाव का असली फैसला जयपुर की बैठकों में नहीं, गांव की चौपाल, शहर की गलियों और मतदाता के मन में लिखा जाता है। इसलिए शायद समय की सबसे बड़ी जरूरत अफसरों से ज्यादा जनता और कार्यकर्ताओं की आवाज सुनने की है।

नोट - ये लेख जनता की प्रतिक्रिया है ।

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