जयपुर, 07 अप्रैल 2026(न्याय स्तंभ)। नगर निगम की नाक के नीचे वर्षों से फर्जी नौकरी के नाम पर ठगी का बड़ा नेटवर्क सक्रिय रहा, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी या तो अनजान बने रहे या फिर जानबूझकर आंखें मूंदे बैठे रहे। “न्याय स्तंभ” ने समय-समय पर इस पूरे मामले को उठाकर प्रशासन को चेताया, लेकिन हर बार कार्रवाई का आश्वासन ही मिला, जमीनी स्तर पर कुछ नहीं बदला।
संजीव वर्मा और उससे जुड़ी संस्था CLC पर लंबे समय से नौकरी दिलाने के नाम पर पैसे ऐंठने, फर्जी नियुक्ति पत्र देने और लोगों को गुमराह करने जैसे गंभीर आरोप लगते रहे हैं। सबसे हैरानी की बात यह है कि जिस संस्था के नाम पर वर्मा नगर निगम में सक्रिय रहा, उस संस्था का वास्तविक अस्तित्व और मालिक तक स्पष्ट नहीं है। इसके बावजूद वह खुलेआम नगर निगम के नाम का इस्तेमाल करता रहा।
नगर निगम और स्वायत्त शासन विभाग (DLB) की भूमिका इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा सवालों के घेरे में है। दोनों ही विभाग आज तक एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते नजर आते हैं। निगम के कई अधिकारियों ने तो साफ तौर पर यह कह दिया कि उन्हें यह तक नहीं पता कि “राष्ट्रीय शहरी आजीविका संस्थान” क्या है, उसका काम क्या है और आखिर उसका कार्यालय निगम परिसर में कैसे संचालित हो रहा है।
गौरतलब है कि पहले भी CLC कार्यालय को लेकर नोटिस जारी किए गए, लेकिन हर बार DLB के स्तर पर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। यही कारण है कि तमाम विवादों और शिकायतों के बावजूद आज भी यह कार्यालय खुलेआम चल रहा है और वहां स्टाफ नियमित रूप से काम करता नजर आता है।
और भी चौंकाने वाली बात यह है कि कई निगम अधिकारियों को यह तक जानकारी नहीं है कि संजीव वर्मा के खिलाफ कभी कोई कार्रवाई हुई भी है या नहीं। वहीं प्रोजेक्ट डायरेक्टर श्री चंद का कहना है कि खबर सामने आने के बाद कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है, लेकिन सवाल यही है कि जब पहले से इतने आरोप सामने आ चुके थे, तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
इस पूरे मामले में सिरोही कनेक्शन भी सामने आ चुका है, जहां इसी नेटवर्क के जरिए लोगों को नौकरी का झांसा देकर ठगी की गई। पीड़ितों को फर्जी नियुक्ति पत्र थमाए गए और बाद में वेतन के नाम पर टालमटोल किया गया। इसके बावजूद कार्रवाई सीमित ही रही, जिससे पूरे नेटवर्क के संरक्षण पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
अब जब मामला खुलकर सामने आ चुका है, तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह सिर्फ लापरवाही है या फिर पूरे सिस्टम की मिलीभगत? जब एक विवादित संस्था वर्षों तक नगर निगम परिसर में बैठकर खुलेआम काम करती रही, तो जिम्मेदारी तय करना जरूरी हो जाता है। अगर समय रहते सख्त कार्रवाई की जाती, तो कई लोग इस ठगी का शिकार होने से बच सकते थे। अब देखना यह है कि प्रशासन इस बार भी चुप्पी साधे रहता है या फिर वास्तव में कोई ठोस कदम उठाए जाते हैं।